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इतिहास

सार्वजनिक सेवा के क्षेत्र में पारिवारिक विरासत और निजी संबंधों ने उनके व्‍यक्तिगत, पेशेवर और राजनीति जीवन में एक महतवपूर्ण भूमिका निभायी है। ज्‍योतिरादित्‍य के पिता, श्री माधवराव सिंधिया ने हमेशा उनके अंदर एक अनुशासित नैतिकता और लोगों को सशक्‍त बनाने की तरफ कदम बढ़ाने की भावना पैदा करने का प्रयास किया है। इसके साथ वह सकारात्‍मक समाज में योगदान करने की भावना की जिम्‍मेदारी के साथ बढ़े हुए। ज्योतिरादित्य ने अपने पिता के जीवन के आदर्शों, नैतिक मूल्यों और सिद्धांतों, सादगी, भक्ति, प्रतिबद्धता को अपपने लक्ष्‍य की प्राप्ति के लिए प्रेरणा माना है। यह ज्‍योति‍रादित्‍य का स्‍थायी विरासत है जिसे उन्‍होंने अपने पिता से आत्‍मसात किया है।

श्री माधवराव सिंधिया को विनचेस्‍टर कॉलेज और न्‍यू कॉलेज, यूनाइटेड किंगडम के ऑक्‍सफोर्ड विश्‍वविद्यालय में जाने से पहले ग्वालियर के सिंधिया स्कूल में शिक्षा ग्रहण की।

1947 में भारत के स्‍वतंत्र होने के बाद, ग्वालियर रियासत भारत संघ के राज्‍य मध्‍य भारत का हिस्‍सा बना जो 1956 में बने नये राज्‍य मध्‍य प्रदेश में विलय कर लिया गया। ज्योतिरादित्य के दादा श्री जिवाजीराव सिंधिया मध्‍य भारत के पहले राजप्रमुख थे। ग्वालियर राज्य अपने समय के प्रगतिशील राज्‍यों में से एक था जिसने शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की थी।

श्री माधवराव सिंधिया ग्वालियर के आखिरी सत्तारूढ़ महाराजा थे: उन्‍होंने अपने पारिवारिक परंपरा की तरह ही जनता की सेवा की जिसके परिणाम स्‍वरूप केवल 26 वर्ष की आयु में ही 1971 में लोक सभा के सांसद चुने गये। ग्‍वालियर और गुना निर्वाचन क्षेत्र से लगातार नौ बार उन्‍होंने चुनाव जीता। ज्योतिरादित्य के जीवन में उनके पिता एक मार्गदर्शक शक्ति रहे हैं। 1984 में मात्र 13 की उम्र में ही ज्योतिरादित्य ने अपने पिता के लिए प्रचार अभियान चलाया और उनके सभी अभियानों में खुद को शामिल भी किया।