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इतनी योजनाएं फिर भी कुपोषण

हिंदुस्तान

26-09-2016

आज भारत बड़े विरोधाभास से गुजर रहा है। एक तरफ तो हम इतने अन्न का उत्पादन करते हैं, जिससे समस्त देशवासियों का पेट भरा जा सके, दूसरी तरफ देश के विभिन्न हिस्सों में आज भी लाखों बच्चे भूख से तड़प रहे हैं। भारत 2022 में सबसे अधिक आबादी वाला देश बनने वाला है। इसके मद्देनजर आज अपने मानव संसाधन की इस पूंजी में निवेश करना समय की बड़ी जरूरत है।

किसी भी मनुष्य को दिए जाने वाले पोषण का प्रभाव सीधे उसके कार्य सीखने और करने की क्षमता पर पड़ता है। जाहिर सी बात है कि सामूहिक रूप से ‘जन-जन’ की उन्नति से होने वाला योगदान पूरे देश की आर्थिक व्यवस्था को बदलने का माद्दा रखता है।

आज समस्या यह नहीं है कि हमारे पास कुपोषण से लड़ने वाली योजनाओं की कमी है। आईसीडीएस, पीडीएस, मध्याह्न भोजन योजना आदि ढेरों योजनाएं सरकार की तरफ से बनाई गई हैं, लेकिन कुपोषण एक ऐसी समस्या है, जिस पर अन्य समस्याओं, जैसे लोगों की आर्थिक स्थिति, शिक्षा, स्वच्छता, महिलाओं की सामाजिक स्थिति, स्वास्थ्य आदि सभी मामलों के साथ नए सिरे से एक ताने-बाने को बुन कर उनका समाधान निकालते हुए ही जीता जा सकता है। हमारे आंगनबाड़ी केंद्रों की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। हकीकत यही है कि सौ बच्चों की उपस्थिति दिखाने वाले कई केंद्रों में 20 बच्चे भी नहीं होते। सरकार पोषण पर हर साल तकरीबन आठ हजार करोड़ रुपये खर्च करती है, लेकिन इस सबके बावजूद लगभग 25 लाख बच्चे आज भी हर साल कुपोषण से अपनी जान गंवा रहे हैं।

मध्य प्रदेश का ही उदाहरण ले लीजिए। यहां श्योपुर जिले में पिछले दो महीनों में 19 बच्चों की कुपोषण से मृत्यु हो चुकी है, लेकिन राज्य सरकार राहत प्रदान करने की बजाय मृत्यु के असली कारण पर पर्दा डालने में लगी हुई है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन द्वारा भेजी गई दस टीमों ने यहां पांच दिनों में ही 461 कुपोषित बच्चे ढूंढ़ निकाले। प्रदेश में शिशु मृत्यु दर 51 पर है, जबकि देश के पैमाने पर यह दर 39 है। राज्य प्रशासन ने दो वर्षों में 2,503 करोड़ कुपोषण पर खर्च किए, लेकिन महिला और बाल विकास विभाग के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में अब भी 13 लाख बच्चे कुपोषित हैं। प्रदेश की स्वास्थ्य प्रणाली में चाहे डॉक्टरों की भारी कमी हो या स्वास्थ्य सेवाओं-सुविधाओं की बदतर स्थिति, लोगों की परेशानियों का कोई अंत नहीं है। राज्य की आबादी के अनुपात में यहां जरूरत है सात हजार डॉक्टरों की, लेकिन उपलब्ध सिर्फ 3,000 हैं। इसी तरह, 1989 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की जगह सिर्फ 1,171 केंद्र काम कर रहे हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 कहता है कि मातृत्व और शैशवावस्था के मामले में स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों पर होने वाला निवेश दीर्घकालिक लाभ का मामला है, लेकिन हम इस मानव पूंजी का लाभ उठाने की बजाय उसे जाया किये जा रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, कुपोषण के कारण भारत की जीडीपी को कम से कम दो-तीन प्रतिशत तक हानि पहुंच रही है, लेकिन क्या ये आंकड़े देश को असल में पहुंच रहे नुकसान का अनुमान लगाने के लिए पर्याप्त हैं? कुपोषण के विरुद्ध यह लड़ाई अब एक राजनीतिक मामला नहीं रह गई है, यह मानवीयता का, मानवीय संवदेना का मामला बन चुकी है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज जो बच्चे कुपोषण की बलि चढ़ रहे हैं, वही आगे चलकर देश के कामगार बनते, भविष्य बनते। इनके उत्थान, इनकी रक्षा और इनके विकास में ही देश का विकास निहित है।

कुपोषण को जड़ से खत्म करने के लिए हमें ठोस कदम उठाने होंगे। पहला- देश में आईसीडीएस (पोषण), पीडीएस (आहार), मनरेगा (रोजगार) आदि कई योजनाएं अलग-अलग स्तरों पर कार्य कर रही हैं, जबकि सबसे पहले हमें एक ‘कुपोषण उन्मूलन मिशन’ की जरूरत है, जिसके तहत अन्य विभाग चाहे महिला व बाल विकास हो, ग्रामीण विकास या स्वास्थ्य विभाग- सभी के कार्यों और योजनाओं को सम्मिलित कर एक दायरे में लाया जा सके। हर जिम्मेदार विभाग की अपने विशिष्ट लक्ष्यों के लिए जवाबदेही केंद्र में स्थापित एक स्वतंत्र प्राधिकरण को होनी चाहिए। दूसरा-आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से नीति-निर्माताओं के पास सही जानकारी व डाटा पहुंचाने की जरूरत है। तकनीक का एक और बेहतरीन उपयोग नियंत्रण और ऑडिट के लिए भी किया जाना चाहिए।

जैसे कि आंगनबाड़ी केंद्रों को दी जाने वाली सामग्री के डाटा के साथ-साथ यह जानने की भी व्यवस्था हो कि लाभार्थियों को असल में कितना फायदा हो रहा है। तीसरा- जिन परिवारों के बच्चों में कुपोषण की पहचान की जा चुकी है, उन्हें खासकर मनरेगा के तहत रोजगार सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए। हमारे स्वास्थ्य केंद्रों और पोषण पुनर्वास केंद्रों में उपयुक्त उपकरण और कार्यकर्ताओं का प्रबंध भी होना चाहिए, खासकर उन क्षेत्रों में, जहां कुपोषित बच्चों की संख्या काफी अधिक पाई गई है। इस पूरी कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले चिकित्सक, आशा-आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, नर्स आदि को अनदेखा नहीं किया जा सकता। उन्हें न सिर्फ बेहतर प्रशिक्षण और प्रोत्साहन की जरूरत है, बल्कि इस ‘कुपोषण उन्मूलन मिशन’ में उन्हें एक अहम भागीदार बनाकर साथ लेकर चलने की जरूरत भी है।

यहां सवाल यह है कि क्या केंद्र सरकार देशवासियों की यह मूलभूत जरूरत पूरी कर पाएगी? या इन मासूमों की पुकार उसके खोखले नारों और वादों में दबकर रह जाएगी? ‘स्किल इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘मेक इन इंडिया’ के जो स्वप्न करोड़ों भारतवासियों को दिखाए गए हैं, क्या वे ऐसी विषम परिस्थितियों में साकार हो सकेंगे? आज भी भारत में हर तीन में से एक बच्चा अपनी असल योग्यताओं को विकसित करने में असमर्थ है , ऐसे में ‘स्मार्ट सिटी’ की बात करने का भला क्या मतलब, अगर वहां बसर करने वाले भुखमरी की स्थिति में जीवन-यापन कर रहे हों? जब तक भारत का एक भी बच्चा भूखे पेट सोने को मजबूर रहेगा, तब तक ‘सबका साथ सबका विकास’ का यह नारा केवल रेगिस्तान में मृगतृष्णा बनकर रह जाएगा।